Friday, 21 November 2014

राहे

हर राह को मै चाहू, हर मंजिल मुझको भाती है
मेरी कोई दिशा नहीं, सिर्फ हवा मुझे बहलाती है
प्रवाह जिधर भी तेज हुआ ,ते उधर निकल लेता हु मै
मांग जिधर भी तेज हुई, ते उधर खिसक लेता हु मै
मेरी आँखों के सपने हर पल पल पल पल बदले है
मेरे खवाबो के परिंदे ,आसमान में भटके हे
जाने की कोई राह नहीं ,बस आस लगाए बैठे हे
मन की बत्ती को बजाए ,जुगनू पे तो तरसे हे



काश काश के मंत्रो को मै  अब तक जबते आया हु
भेड़ चल के सम्मोहन से मै  खुद ना बच पाया हु
राह चुनी मेने ओ साहब जिसने मुझे मजबूर बनाया
अपने हाथो अपनी खुशियो का ही  मेने गला दबाया
काश तवज्जो दी होती मेने ही खुद की बातो को
तस्वीर अलग होगी मेरी सपनो की रातो को
नींद सुकून की मुझको आती साडी दुनिया मुझको भाती
जेब भले  ही छोटी   होती , सोच बड़ी तब रखता मै
अपनी राहे , अपनी मंज़िल खुद तभी तो बुनता मै।

मै ,आज



बेचैन दिल  मेरा कुछ करने को चाहता है
पर क्या करू यह समझ नहीं आता हे
उठा पटक  का आया कुछ ऐसा मंज़र हे
मेरी आँखे आज आसुओ  समंदर है
रह रह कर   मेरी पुरानी यादे मुझको कसोटती हे
ईर्षा ,निंदा और घृाड़ा के बीच मुझमे पिरोती हे 

थक गया हु मै ,,ऐसी जिंदगी जीते जीते 
जहा व्यर्थ की पुकार हे ,,भावनाओ का व्यापर हे 
और डर डर  का भंडार है 
जहा हर वक़्त पुरानी सोच नए मुददो पर हावी होती हे 
जहा हर समय दिल और दिमाग़ में जंग छिड़ी होती हे 
जहा वक़्त से ज्यादा हम खवाबो में जीते हे ,,,
सच की परिभासा से भी डरते हे 
कुछ करना न पड़े ,,,इसलिए सपनो के आँगन में सोते हे 
जहा दिमाग को भट्टी बनाकर ,,बोली में आग भरते हे 
जहा  अरमानो की धुंद  से ,, मकसद को पर रखते हे 
कहते तो बहुत हे ,,,की हिम्मत और हौसले से सब मिलता हे 
पर राहे  अगर भटकी हो तो अँधेरा ही दिखता है। 

क़ुर्बानी






यह वक़्त की नजाकत है ,,, या मेरे कर्मो का पाप
जिस जीज को चाहू मै वो साली दूर चली जाती है 
इसलिये तो तुझे कभी नहीं कहा मेने अपना 
तू रुस्वा ही सही पर पास तो रहती हे। 

Saturday, 8 November 2014

स्वच्छ भारत अभियान





आवाज़ उठी है जन जन से
अब धूल [गन्दगी ] नहीं रहने देँगे
अब और गरल अपमानों का हम खुद नहीं सहने देंगे
बदलाव जिंदगी में कुछ लाकर ऐसा कुछ कर जाएगे
मान करेगी दुनिया सारी आदर्श इस्थापित कर जाएगे

अधूरा- सच


यू तो बात करते हे सभी अपने आदर्शो  कि
मगर पूरी  नहीं होती जब भी बात हो सच्ची
जाने  किन खयालो में यो रहते हे खुदा जाने
तमना हर किसी कि हर समय पूरी नहीं होती। ……………………


न सोचा था  कभी एक दिन की मौसम भी आएगा 
कूड़े के यू ढेरो से कोई रोटी चुराएगा 
वजह से जिनकी  जिंदगी आबाद हे इस ज़माने में [किसान ]
यही देखो सबक हमको जीवन अंत सीखते है


जिसे चाहा ,,जिसे पूजा वही  तो बेवफा निकला
सहीदो  कि शहादत से वही  तो बेखबर निकला
ज़माने में बिक़े हर चीज़,, जाने क्यों  यह लगता है [मुवाजा ]
कोई पूछे,जरा सोचे दिलो में दर्द कितना पलता  है /////

वेदना नारी की





अंधेरो कि काली छाया से मुझको डर  लगता हे
रावन कि तिरछी नज़रों से ही मुझको डर लगता हे
 मेरा डर नजायज नहीं , जायज पहलू ले बैठा हे
वयवसाय करण कि आंधी  ने मुझे बोझ समझ  के रखा हे


 जीवन का आरम्भ हुआ , संघर्ष तभी से जारी हे
सम्मानो को लड़ती आई हर अबला हर नारी हे
दुःशाशन आबाद हुए जब जब  कान्हा की मांग बड़ी
संसद भी थी मोन पड़ी जब जब नारी बेमौत मरी


नारी तो मरती रहती हे अपने ही चौराए पे
कही दहेज़ और कही तो अपनों की मनमानी पे
कही तेज़ाबो की बूंदे उसका तो जीवन वारे हे
और कही अग्नि की लपटों से ही सवर्ग सिधारे हे  \\\\\\

टिकट





    टिकट की माथापच्ची है.
   बात मेरी तो सच्ची ह 
   टिकट मुझे दिलवाद्ये प्यारे 
   मेरी इमेज न अच्छी है 
   इमेज मेरी जो अच्छी होती 
   तो क्या मै नेता बनता 
  छोड़ शरीफो कि मैफिल 
  मै  क्यों गुंडों में सामिल होता 
  चोर चोर मौसरे भाई कहावत कहलाती है 
  छल कपट के मंजर से सीता लंका को आती है
  जात पात में तुमे बाटकर हमने तो रोटी सेकी
 जब जब आते ही चुनाव ,,
  हमने वादो कि बोटी फेकी
 तुम सडको पर घुट घुट जीते
  ठाट भाट हम रहते है
 तुम तरसो तो बूँद बूँद
  हम भोग भी छपन लेते है
 शैतानो कि टोली भी
  हमसे तो डर कर रहती है
 हम जो रास्ता   काट दिए
 तो बिल्ली घर को लौटी है
मेरा सच न जाने कु कुछ फीका फीका लगता है
मेरी बातो के पीछे गन्घोर अंधेरा दीखता है